जड़ों से कटता समाज: विकास की दौड़ में कहीं पीछे तो नहीं छूट रहे हमारे गांव?

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आर. के. जोशी (वरिष्ठ पत्रकार, नोहर, राजस्थान)

भारत को सदियों से गांवों का देश कहा जाता रहा है। हमारी सभ्यता, संस्कृति, लोक परंपराएं और सामाजिक जीवन गांवों की मिट्टी में पले-बढ़े हैं। गांव केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन की आधारशिला हैं। किंतु बदलते समय के साथ एक ऐसा परिवर्तन सामने आ रहा है, जो विकास की चमक के पीछे छिपे एक गंभीर सामाजिक संकट की ओर संकेत करता है। आर्थिक उन्नति और आधुनिक जीवनशैली की तलाश में गांव धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं। पुश्तैनी मकानों पर ताले लटक रहे हैं, चौपालें सूनी हैं, मंदिरों में पहले जैसी रौनक नहीं रही और त्योहारों का सामूहिक उल्लास अब स्मृतियों तक सिमटता जा रहा है।रोजगार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और आधुनिक सुविधाओं की चाह में शहरों की ओर पलायन स्वाभाविक है। हर व्यक्ति अपने परिवार के बेहतर भविष्य का सपना देखता है और उसे पूरा करने का अधिकार भी रखता है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब यह पलायन केवल स्थान परिवर्तन नहीं रह जाता, बल्कि व्यक्ति अपनी जड़ों, रिश्तों, संस्कारों और सांस्कृतिक विरासत से भी दूर होता चला जाता है। विडंबना यह है कि जिन लोगों के गांवों में विशाल आंगन, खुले घर और प्राकृतिक परिवेश थे, वे आज महानगरों के सीमित फ्लैटों में जीवन बिताने को विवश हैं। पड़ोसियों के बीच आत्मीयता की जगह औपचारिकता ने ले ली है। गांवों की चौपाल, कुएं, मंदिर और सामाजिक मेल-मिलाप के केंद्र धीरे-धीरे वीरान हो रहे हैं। कई स्थानों पर मंदिरों में नियमित पूजा के लिए वेतनभोगी पुजारियों की व्यवस्था करनी पड़ रही है, क्योंकि स्थानीय परिवार स्थायी रूप से शहरों में बस चुके हैं। विकास का वास्तविक अर्थ केवल ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और आधुनिक तकनीक नहीं है। सच्चा विकास वही है, जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक संबंधों को भी सहेजकर रखे। यदि हमारी नई पीढ़ी अपने गांव, खेत-खलिहान, कुलदेवता, पारिवारिक मंदिर और लोक परंपराओं से अनजान रह जाएगी, तो यह केवल एक स्थान का नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का भी क्षरण होगा।             आज आवश्यकता इस बात की है कि गांवों को केवल जन्मस्थान नहीं, बल्कि अपनी पहचान और अस्तित्व का आधार माना जाए। यदि परिस्थितियां गांव में स्थायी रूप से रहने की अनुमति नहीं देतीं, तो भी त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और अवकाश के अवसरों पर गांव लौटने की परंपरा जीवित रखी जानी चाहिए। होली, दीपावली, तीज, रक्षाबंधन और अन्य पर्व तभी अपनी वास्तविक गरिमा बनाए रख पाएंगे, जब परिवार अपनी जड़ों से जुड़ा रहेगा। सरकारों की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि गांवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, स्थानीय रोजगार, डिजिटल कनेक्टिविटी और मजबूत बुनियादी ढांचे का विकास किया जाए। यदि गांवों में अवसर उपलब्ध होंगे, तो पलायन मजबूरी नहीं, बल्कि एक विकल्प बन जाएगा। साथ ही समाज को भी यह समझना होगा कि आर्थिक सफलता का अर्थ अपनी सांस्कृतिक धरोहर को पीछे छोड़ देना नहीं है। आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। शहरों में रहकर भी गांवों से भावनात्मक और सामाजिक जुड़ाव बनाए रखा जा सकता है। तकनीक और विकास के इस युग में यदि हमने अपनी जड़ों की ओर लौटने का प्रयास नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियां शायद केवल इतिहास की पुस्तकों में पढ़ेंगी कि कभी भारत की आत्मा गांवों में बसती थी। विकास की राह पर आगे बढ़ना आवश्यक है, लेकिन इतना भी आगे नहीं कि लौटने पर अपनी ही मिट्टी हमें पहचान न सके। यही संतुलन भविष्य के भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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