सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का विधेयक न्याय व्यवस्था को देगा मजबूती : डॉ. नरेश बंसल

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राज्यसभा में कहा— समय पर न्याय मिलना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार, लंबित मामलों के बोझ को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

अमित गुप्ता 

नई दिल्ली। राज्यसभा सांसद डॉ. नरेश बंसल ने बुधवार को राज्यसभा में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक-2026 पर चर्चा में भाग लेते हुए विधेयक का जोरदार समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह केवल चार नए न्यायाधीशों के पद बढ़ाने का प्रस्ताव नहीं, बल्कि देश की न्यायिक व्यवस्था की संस्थागत क्षमता को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम है।       डॉ. बंसल ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार सदन के प्रति उत्तरदायी होती है। जब संसद का सत्र नहीं चलता और तत्काल कानून बनाने की आवश्यकता होती है तो सरकार अध्यादेश लाती है, जिसे बाद में संसद में चर्चा के बाद विधेयक के रूप में पारित कराया जाता है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक भी सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश-2026 का स्थान लेगा।उन्होंने बताया कि विधेयक के तहत सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 की जाएगी। मुख्य न्यायाधीश सहित कुल न्यायाधीशों की संख्या 38 हो जाएगी। इसके लिए आवश्यक प्रशासनिक ढांचे और वित्तीय प्रावधान भी किए गए हैं।

95 हजार से अधिक मामले लंबित

डॉ. बंसल ने सदन को बताया कि वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में 95 हजार से अधिक मामले लंबित हैं। वर्ष 2025 में 75,410 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 65,615 मामलों का निस्तारण हुआ। यानी लगभग 10 हजार नए मामले लंबित रह गए। उन्होंने कहा कि दाखिल होने वाले मामलों की संख्या निस्तारण से अधिक होने के कारण न्यायपालिका पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, जिसे देखते हुए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना समय की मांग है।

त्वरित न्याय संविधान की भावना

उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रत्येक नागरिक को त्वरित न्याय का अधिकार प्राप्त है। न्याय में देरी केवल मुकदमे को लंबित नहीं रखती, बल्कि नागरिकों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास भी कमजोर करती है।

40 साल पुरानी जनहित याचिका अब भी लंबित

डॉ. बंसल ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय में 3,525 जनहित याचिकाएं (PIL) लंबित हैं, जिनमें 698 याचिकाएं एक दशक से अधिक पुरानी हैं। सबसे पुरानी जनहित याचिका वर्ष 1984 की है, जो करीब 40 वर्षों बाद भी लंबित है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति न्याय व्यवस्था की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता को स्पष्ट करती है।

संविधान पीठों का नियमित गठन होगा आसान

उन्होंने कहा कि इस विधेयक से संविधान पीठों का नियमित गठन आसान होगा, जिससे संवैधानिक महत्व के मामलों की सुनवाई नियमित रूप से हो सकेगी और सामान्य अपीलीय कार्य प्रभावित नहीं होंगे।

‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ का किया उल्लेख

अपने संबोधन के दौरान डॉ. बंसल ने कहा, “धर्मो रक्षति रक्षितः”, अर्थात जो न्याय और धर्म की रक्षा करता है, न्याय उसकी रक्षा करता है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका जितनी मजबूत होगी, संविधान उतना ही सशक्त होगा और संविधान जितना मजबूत होगा, नागरिक उतने ही सुरक्षित होंगे। उन्होंने अंत में कहा कि न्याय का मार्ग किसी नागरिक की आर्थिक स्थिति या दूरी से तय नहीं होना चाहिए। समय पर न्याय उपलब्ध कराना ही संविधान के सम्मान और लोकतंत्र की सच्ची भावना है।

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