आर. के. जोशी
(नोहर, राजस्थान)
आधुनिक युग में विकास को प्रगति का पर्याय मान लिया गया है। ऊँची-ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, तेज़ रफ्तार तकनीक और बढ़ती उपभोक्तावादी संस्कृति—ये सभी आज के विकास के प्रतीक बन गए हैं। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे एक गंभीर सवाल छिपा है—क्या यह विकास वास्तव में मानव जीवन को बेहतर बना रहा है, या हम एक अंधी दौड़ में शामिल होकर अपनी मूलभूत आवश्यकताओं और संतुलन को खोते जा रहे हैं? विकास की इस अंधी दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति के साथ अपने संबंध को कमजोर कर लिया है। जंगलों की कटाई, नदियों का प्रदूषण, और बढ़ता जलवायु परिवर्तन इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। आज हवा और पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ भी शुद्ध नहीं रह गई हैं। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि विकास की दिशा कहीं न कहीं असंतुलित हो गई है। इसके साथ ही, मानव जीवन में मानसिक और सामाजिक समस्याएँ भी बढ़ी हैं। प्रतिस्पर्धा की होड़ ने व्यक्ति को तनाव, अवसाद और अकेलेपन की ओर धकेल दिया है। पहले जहाँ समाज और परिवार का साथ जीवन का आधार हुआ करता था, वहीं आज व्यक्ति अपने ही बनाए दायरे में सिमटता जा रहा है। सफलता की अंधी दौड़ में रिश्ते और मानवीय मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। आर्थिक दृष्टि से भी विकास का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हो पाया है। एक ओर जहाँ कुछ वर्ग अत्यधिक संपन्न होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गरीब और अधिक वंचित हो रहे हैं। यह असमानता सामाजिक असंतोष और अस्थिरता को जन्म देती है, जो किसी भी समाज के लिए घातक हो सकती है। हालाँकि विकास आवश्यक है, लेकिन उसका स्वरूप संतुलित और मानवीय होना चाहिए। हमें ऐसा विकास चाहिए जो पर्यावरण की रक्षा करे, सामाजिक समानता को बढ़ावा दे और मानव जीवन को सरल और सुखद बनाए। “सतत विकास” (Sustainable Development) की अवधारणा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों को भी सुरक्षित रखती है। अंततः यह समझना जरूरी है कि वास्तविक विकास केवल भौतिक प्रगति में नहीं, बल्कि मानसिक शांति, सामाजिक समरसता और प्रकृति के साथ संतुलन में निहित है। यदि हम इस अंधी दौड़ को नहीं रोक पाए, तो विकास का यह मार्ग हमें आगे ले जाने के बजाय विनाश की ओर भी ले जा सकता है। इसलिए समय की मांग है कि हम सोच-समझकर, जिम्मेदारी के साथ और संतुलित दृष्टिकोण अपनाकर विकास की दिशा तय करें।











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