65 हजार से अधिक वनस्पति कलाकृतियां संरक्षित, 300 वर्षों तक सुरक्षित रखने का दावा; शोधार्थियों और वैज्ञानिकों के लिए बनेगा वैश्विक ज्ञान केंद्र
अमित कुमार
हरिद्वार। भारत की समृद्ध आयुर्वेदिक और वनस्पति विरासत को विश्व पटल पर नई पहचान देने वाला अनूठा हर्बल आर्ट म्यूज़ियम पतंजलि अनुसंधान फाउंडेशन, हरिद्वार में आकार ले चुका है। संग्रहालय में दुनिया भर की औषधीय एवं जैव-विविधता से समृद्ध वनस्पतियों से संबंधित 65,000 से अधिक वनस्पति कलाकृतियों को संरक्षित किया गया है। इनमें 30,500 रंगीन कैनवास चित्र और करीब 35,000 रेखाचित्र शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इतने बड़े पैमाने पर औषधीय पौधों के वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण के साथ तैयार रंगीन कैनवास चित्रों और रेखाचित्रों का संग्रह विश्व में अपने तरह का अत्यंत विशिष्ट प्रयास है। यही वजह है कि यह संग्रहालय वनस्पति कला, आयुर्वेद और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना रहा है।
30,500 कैनवास और 35 हजार रेखाचित्र
संग्रहालय में सुरक्षित प्रत्येक चित्र केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि वनस्पति विज्ञान से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज है। चित्रों में पौधों की पत्तियों, पुष्पों, फलों, बीजों, संरचना और अन्य विशिष्टताओं को बारीकी से उकेरा गया है। इससे विद्यार्थी, शोधार्थी और वैज्ञानिक वनस्पतियों के अध्ययन में इनका उपयोग कर सकते हैं। इन हस्तनिर्मित कलाकृतियों को आधुनिक संरक्षण तकनीकों के साथ सुरक्षित रखा गया है। संग्रह से जुड़े विशेषज्ञों का दावा है कि ये चित्र लगभग 300 वर्षों तक अपने मूल स्वरूप में सुरक्षित रह सकते हैं।
1762 स्लाइडर्स और 50 लकड़ी की अलमारियों में संग्रह
हजारों कलाकृतियों को व्यवस्थित रखने के लिए पूरे संग्रह को वर्णानुक्रम में वर्गीकृत किया गया है। रंगीन कैनवास चित्रों को 1,762 विशेष स्लाइडर्स में व्यवस्थित किया गया है, जबकि रेखाचित्रों को 50 विशेष रैक्स वाली 50 लकड़ी की अलमारियों में संरक्षित किया गया है। यह व्यवस्थित संग्रह आने वाली पीढ़ियों के लिए वनस्पति विज्ञान, आयुर्वेद, औषधीय पौधों और जैव-विविधता के अध्ययन में महत्वपूर्ण संसाधन साबित हो सकता है।
आचार्य बालकृष्ण के संकल्प से साकार हुआ सपना
इस संग्रहालय के पीछे पतंजलि योगपीठ के महामंत्री एवं आयुर्वेद शिरोमणि आचार्य बालकृष्ण का संकल्प बताया जाता है। कोलकाता प्रवास के दौरान उन्होंने भारतीय कलाकारों द्वारा तैयार करीब 3,000 संरक्षित वनस्पति चित्रों का संग्रह देखा। इसी दौरान उनके मन में विचार आया कि जब विदेशी संस्थानों में भारतीय वनस्पतियों को व्यवस्थित रूप से संरक्षित किया जा सकता है तो भारत में अपनी समृद्ध औषधीय परंपरा का विशाल दृश्य संग्रह क्यों नहीं तैयार किया जा सकता। हरिद्वार लौटने के बाद वनस्पति वैज्ञानिकों और कलाकारों की अलग-अलग टीमें गठित की गईं। वर्षों तक चले शोध, दस्तावेजीकरण और कलात्मक कार्य के बाद यह विशाल संग्रह तैयार हुआ।
कैनवास पर जीवंत नजर आती हैं वनस्पतियां
संग्रहालय की प्रमुख विशेषता करीब एक मीटर आकार के हस्तनिर्मित कैनवास चित्र हैं। ऐक्रेलिक माध्यम से तैयार इन चित्रों में पौधों की आकृति, रंग, बनावट और सूक्ष्म संरचनाओं को इतनी बारीकी से दर्शाया गया है कि पहली नजर में वे वास्तविक पौधों जैसी प्रतीत होती हैं। कलात्मक सुंदरता के साथ इन चित्रों में वैज्ञानिक विवरण को भी महत्व दिया गया है, जिससे यह संग्रह कला और विज्ञान के बीच सेतु का काम करता है।
वैज्ञानिक जगत में भी मिली पहचान
इस अनूठे प्रयास का उल्लेख प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल National Academy Science Letters में भी किया जा चुका है। आचार्य बालकृष्ण के अनुसार, यह संग्रह 20वीं और 21वीं सदी के समृद्ध वनस्पति कला संग्रहों में अपनी विशिष्ट पहचान बना सकता है। उनका कहना है कि यह संग्रह पौधों, आयुर्वेद, विज्ञान और कला में रुचि रखने वाले लोगों के लिए समान रूप से उपयोगी होगा।
ब्रिटेन और अमेरिका के प्रतिष्ठित संस्थानों से अलग पहचान
विश्व के प्रसिद्ध संस्थानों Royal Botanic Gardens, Kew और Hunt Institute for Botanical Documentation में भी वनस्पति कला के महत्वपूर्ण संग्रह मौजूद हैं। इनमें तैलचित्र, वॉटरकलर, स्केच और अन्य कलात्मक अभिलेख शामिल हैं। वहीं भारत के Central National Herbarium में भी हजारों वनस्पति चित्र संरक्षित हैं। पतंजलि का दावा है कि विशाल संख्या में व्यवस्थित, वैज्ञानिक रूप से वर्गीकृत और हस्तनिर्मित कैनवास चित्रों का यह संग्रह आकार, विविधता और प्रस्तुति के लिहाज से विशिष्ट है।
शोधार्थियों के लिए बनेगा ज्ञान का केंद्र
पतंजलि अनुसंधान फाउंडेशन में एक ही परिसर में संरक्षित यह संग्रह भविष्य में शोधार्थियों, वनस्पति वैज्ञानिकों, आयुर्वेद विशेषज्ञों और जैव-विविधता पर काम करने वाले वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ केंद्र बन सकता है। इसका उद्देश्य केवल अतीत की वनस्पति विरासत को संरक्षित करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को शोध और ज्ञान के लिए एक समृद्ध आधार उपलब्ध कराना भी है।
«“यह हर्बल आर्ट म्यूज़ियम केवल चित्रों का संग्रह नहीं, बल्कि भारत की आयुर्वेदिक परंपरा, वैज्ञानिक दृष्टि और कलात्मक अभिव्यक्ति का अद्वितीय संगम है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान, शोध और प्रकृति संरक्षण की अमूल्य धरोहर सिद्ध होगा।”
— आचार्य बालकृष्ण, महामंत्री, पतंजलि योगपीठ»












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