हरिद्वार-रुड़की मार्ग पर स्थानों के नामों में 30 से अधिक बड़ी गलतियां, स्थानीय पहचान और भाषा के प्रति लापरवाही पर उठे सवाल
हरिद्वार। राष्ट्रीय राजमार्गों पर यातायात सुविधाओं और संकेतकों को बेहतर बनाने के लिए लगाए गए नए साइन बोर्ड अब अपनी भाषा संबंधी गलतियों को लेकर चर्चा में हैं। हरिद्वार से रुड़की के बीच करीब 30 किलोमीटर के मार्ग पर स्थानों, गांवों, नदियों और प्रमुख स्थलों के नामों में इतनी बड़ी संख्या में त्रुटियां सामने आई हैं कि यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि नामपट्ट तैयार करने से पहले स्थानीय स्तर पर इनकी पुष्टि क्यों नहीं की गई। लेखक डॉ. सुशील उपाध्याय के अनुसार, गंगा की दो धाराओं के बीच स्थित डैम कोठी को कहीं ‘दम कोठी’ और बाद में ‘डाम कोठी’ लिखा गया। भगवान चंद्राचार्य चौक का नाम ‘चंद्र चरा चौक’ तक कर दिया गया। सार्वजनिक चर्चा के बाद कुछ त्रुटियों को सुधारा गया, लेकिन कई स्थानों के नाम अभी भी गलत रूप में दिखाई देते हैं।
30 किलोमीटर में 30 से अधिक बड़ी गलतियां
हरिद्वार-रुड़की मार्ग पर लगे नामपट्टों और संकेतकों में 30 से अधिक बड़ी भाषाई एवं नाम संबंधी गलतियां सामने आने का दावा किया गया है। इनमें टोडा कल्याणपुर को ‘तोदा कल्याणपुर’, भुक्कनपुर को ‘बुक्कं पुर’ और रोहालकी को ‘रूहलकी’ लिखा गया है। हॉकी खिलाड़ी वंदना कटारिया के नाम तक में गलती करते हुए उन्हें ‘वंदना कटेरिया’ लिखा गया। खास बात यह है कि उनके नाम पर हरिद्वार में स्टेडियम भी है। लेखक के अनुसार, इन त्रुटियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं स्थान-नामों का निर्धारण या अनुवाद मशीन अथवा एआई आधारित प्रक्रिया से तो नहीं कराया गया। यदि ऐसा हुआ है तो अंतिम रूप से संकेतकों को स्वीकृत करने से पहले मानव विशेषज्ञों और स्थानीय प्रशासन से सत्यापन कराया जाना चाहिए था।
‘रुड़की’ भी चार अलग-अलग रूपों में
गलतियों का सिलसिला केवल गांवों के नाम तक सीमित नहीं है। रुड़की शहर का नाम अलग-अलग स्थानों पर चार रूपों—‘रुड़की’, ‘रूड़की’, ‘रुडकी’ और ‘रूडकी’—में लिखा गया है। इसी तरह मुजफ्फरनगर के नाम में कहीं नुक्ते का प्रयोग किया गया है तो कहीं उसे छोड़ दिया गया है। मुस्लिम समुदाय के प्रमुख तीर्थस्थल पीरान कलियर के नाम को भी कहीं ‘पिरन कलियर’ तो कहीं ‘पिरान कलियर’ लिखा गया है।
‘धन देरा’ और ‘जौरसी’ जैसे नाम
स्थान-नामों में सबसे रोचक बदलाव गांवों और कस्बों के नामों में देखने को मिल रहे हैं। रुड़की से सटे ढंडेरा को ‘धन देरा’, जौरासी को ‘जौरसी’ और ब्रह्मपुर को ‘बरमपुर’ लिख दिया गया है। इसी तरह सौलानी नदी का नाम ‘सौलनी’ और देहरादून से हरिद्वार आने वाले मार्ग पर सोन्ग नदी का नाम ‘सांग’ लिखा गया। इसी मार्ग पर लाल तप्पड़ को ‘लाल टप्पर’ लिख दिया गया था। स्थानीय लोगों के विरोध के बाद संबंधित बोर्ड को पुतवाकर उसका नाम सही कराया गया।
‘हर की पैड़ी’ के भी अलग-अलग नाम
लेखक के अनुसार, हरिद्वार की पहचान हर की पैड़ी का नाम भी अलग-अलग स्थानों पर तीन तरह से लिखा गया है। जबकि किसी शहर, गांव या ऐतिहासिक स्थल का नाम केवल एक सामान्य शब्द नहीं होता, बल्कि उसके पीछे इतिहास, संस्कृति और स्थानीय परंपरा जुड़ी होती है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर स्थानों के नाम रोमन लिपि में सही लिखे गए हैं, लेकिन देवनागरी में लिखते समय स्थानीय संदर्भों की पर्याप्त जांच नहीं की गई। इसका परिणाम यह हुआ कि जमालपुर कलां को ‘जमालपुर कलान’ और जिया पोता को ‘जिया पोटा’ जैसे रूप दे दिए गए।
‘दुर्घटना की आशंका’ की जगह ‘संभावना’
सिर्फ स्थान-नाम ही नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा से जुड़े संदेशों की भाषा पर भी सवाल उठाए गए हैं। उदाहरण के तौर पर ‘दुर्घटना की आशंका’ की जगह ‘दुर्घटना की संभावना’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। भाषा की दृष्टि से ‘आशंका’ शब्द संभावित नकारात्मक घटना के संदर्भ में अधिक उपयुक्त माना जाता है।
प्रमाणित सूची से तैयार होने चाहिए थे संकेतक
डॉ. सुशील उपाध्याय का कहना है कि शहर, गांव अथवा किसी स्थान का आधिकारिक नाम बदलने का अधिकार संबंधित सरकार के पास होता है। इसलिए राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगाए जाने वाले संकेतकों में किसी स्थान का नाम लिखते समय स्थानीय प्रशासन और राजस्व विभाग से प्रमाणित नामों की सूची ली जानी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि यदि एआई या मशीन अनुवाद का इस्तेमाल किया गया है तो अंतिम स्वीकृति मानव विशेषज्ञों द्वारा की जानी चाहिए थी। तकनीक काम को आसान बना सकती है, लेकिन स्थानीय इतिहास, भाषा और सांस्कृतिक संदर्भ का स्थान नहीं ले सकती।
NHAI कराए भाषाई ऑडिट
डॉ. उपाध्याय ने सुझाव दिया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को राज्यव्यापी अथवा राष्ट्रीय स्तर पर संकेतकों का भाषाई एवं तथ्यात्मक ऑडिट कराना चाहिए। जहां भी स्थान-नामों में त्रुटियां हैं, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर ठीक किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्थानीय विशेषज्ञों, भाषाविदों और राज्य के भाषा विभाग की सहायता लेकर ऐसी गलतियों को आसानी से रोका जा सकता है। सड़कें केवल लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं पहुंचातीं, बल्कि वे उस क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति और पहचान से भी परिचित कराती हैं। ऐसे में यदि सड़क किनारे लगे बोर्डों पर स्थानों के नाम ही गलत लिखे हों तो बाहर से आने वाले लोग क्षेत्र की वास्तविक पहचान को लेकर भ्रमित हो सकते हैं।












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