प्रो. डॉ. नरेश चौधरी ने साझा किए पिछले कुंभ मेलों की घटनाओं और व्यवस्थाओं के जमीनी अनुभव
अमित कुमार
हरिद्वार। सशस्त्र प्रशिक्षण केन्द्र हरिद्वार में कुंभ मेला प्रशिक्षण-2027 के छह दिवसीय पंचम चरण के अंतर्गत प्रशिक्षु पुलिस कार्मिकों को कुंभ मेले की व्यवस्थाओं, भीड़ नियंत्रण, श्रद्धालुओं की सुरक्षा और अखाड़ों की परंपराओं से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां दी गईं। प्रशिक्षण कार्यक्रम में इंडियन रेडक्रॉस उत्तराखण्ड के चेयरमैन प्रो. (डॉ.) नरेश चौधरी ने प्रशिक्षार्थियों को प्रशिक्षण प्रदान किया। प्रो. डॉ. नरेश चौधरी ने प्रशिक्षणार्थियों को कुंभ मेले के इतिहास, विशाल जनसमूह के प्रभावी नियंत्रण, यात्रियों एवं श्रद्धालुओं के साथ व्यवहार तथा साधु-संतों और विभिन्न अखाड़ों की परंपराओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजनों में पुलिस बल की भूमिका केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहती, बल्कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन, आपसी समन्वय और आपदा की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है
पुराने हादसों से सीख लेने पर दिया जोर
प्रो. चौधरी ने वर्ष 1986 के कुंभ मेले में हुई घटना की जमीनी परिस्थितियों से प्रशिक्षार्थियों को अवगत कराया। उन्होंने बताया कि उस समय पुलों की व्यवस्थाओं में कमियां तथा वीआईपी आवागमन से उत्पन्न परिस्थितियां भी चुनौती का कारण बनी थीं। घटना के बाद जांच आयोग की संस्तुतियों के आधार पर अतिरिक्त पुलों का निर्माण तथा वीआईपी घाट की अलग व्यवस्था की गई। उन्होंने सोमवती अमावस्या 1996 की भगदड़ का भी उल्लेख किया, जिसमें जनहानि हुई थी। उन्होंने बताया कि घटना के बाद गठित न्यायिक जांच आयोग की संस्तुतियों के अनुरूप व्यवस्थाओं में सुधार किए गए, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने में मदद मिली। वर्ष 2004 अर्द्धकुंभ मेले के दौरान व्यापारियों एवं पुलिस के बीच हुए विवाद की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि संबंधित जांच आयोग की संस्तुतियों को अमल में लाने के साथ स्थानीय संस्थाओं और मेला प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया गया। इससे भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से प्रभावी ढंग से निपटने में सहायता मिली।
अखाड़ों के साथ बेहतर समन्वय जरूरी
प्रो. चौधरी ने 1998 कुंभ मेले में अखाड़ों से संबंधित विवाद का भी जिक्र किया। उन्होंने प्रशिक्षार्थियों को बताया कि बाद में अखाड़ों के संतों एवं मेला प्रशासन के बीच संवाद और आपसी समन्वय के माध्यम से विवाद का समाधान किया गया। उन्होंने कहा कि कुंभ मेले की सफलता के लिए अखाड़ों, साधु-संतों, स्थानीय संस्थाओं, पुलिस और प्रशासन के बीच निरंतर संवाद बेहद जरूरी है। उन्होंने 2010 कुंभ मेले के अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उस दौरान सामने आई चुनौतियों से सीख लेते हुए बिरला घाट क्षेत्र में अतिरिक्त पुल का निर्माण किया गया। इससे श्री पंचायती जूना अखाड़े के शाही स्नान की शोभायात्रा तथा यात्रियों एवं श्रद्धालुओं के आवागमन के लिए वन-वे यातायात व्यवस्था को प्रभावी बनाने में मदद मिली।
कोविड महामारी की चुनौती से भी कराया परिचित
प्रो. डॉ. नरेश चौधरी ने 2021 कुंभ मेले के दौरान कोविड-19 महामारी की चुनौती का भी विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि महामारी जैसी असाधारण परिस्थिति में साधु-संतों, अखाड़ों, स्थानीय नागरिकों, यात्रियों, स्वयंसेवी संस्थाओं, मेला प्रशासन एवं जिला प्रशासन ने सामूहिक प्रयासों से चुनौती का सामना किया और कुंभ मेला सकुशल संपन्न कराया गया। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कुंभ, अर्द्धकुंभ, कांवड़ मेला, सोमवती स्नान पर्व तथा अन्य प्रमुख स्नान पर्वों के दौरान उन्होंने विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया है। इन आयोजनों के दौरान प्राप्त व्यावहारिक एवं जमीनी अनुभवों को उन्होंने प्रशिक्षणार्थियों के साथ साझा किया। उन्होंने पुलिस कार्मिकों से कहा कि कुंभ मेला 2027 की सफलता के लिए पूर्व अनुभवों से सीख लेते हुए आधुनिक तकनीक, प्रभावी भीड़ प्रबंधन, बेहतर संचार व्यवस्था और विभिन्न विभागों के बीच मजबूत समन्वय पर विशेष ध्यान देना होगा। साथ ही श्रद्धालुओं के प्रति संवेदनशील और सहयोगात्मक व्यवहार भी पुलिस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। प्रशिक्षण के दौरान पुलिस कार्मिकों ने कुंभ मेले की ऐतिहासिक घटनाओं, व्यवस्थागत चुनौतियों तथा उनसे प्राप्त सीख के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की।












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