मृत्यु प्रमाण पत्र पाने की जटिलता के मकड़जाल में मृतक के परिजन

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आर.के.जोशी

नोहर राजस्थान।

मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा सत्य मृत्यु है। लेकिन विडंबना यह है कि किसी परिवार के सदस्य के निधन के बाद, जब परिजन शोक की घड़ी से गुजर रहे होते हैं, उसी समय उन्हें सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने, कागजी औपचारिकताओं और प्रशासनिक जटिलताओं के मकड़जाल में उलझना पड़ता है। मृत्यु प्रमाण पत्र, जो एक बुनियादी और अनिवार्य दस्तावेज है, उसे प्राप्त करना कई परिवारों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं रह गया है। मृत्यु प्रमाण पत्र केवल एक कागज नहीं, बल्कि मृतक की कानूनी पहचान का अंतिम दस्तावेज है। बैंक खाते बंद कराने, बीमा दावा प्राप्त करने, पेंशन हस्तांतरण, संपत्ति के उत्तराधिकार, पारिवारिक पहचान पत्र, आधार, पैन, मतदाता सूची और अन्य अनेक सरकारी एवं निजी कार्यों में इसकी आवश्यकता होती है। इसके बिना मृतक के परिवार के सामने कई आर्थिक और कानूनी समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। दुर्भाग्य से आज भी अनेक क्षेत्रों में मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल बनी हुई है। अस्पताल से मृत्यु की सूचना, नगर निकाय या ग्राम पंचायत में पंजीकरण, विभिन्न दस्तावेजों का सत्यापन, बार-बार कार्यालयों के चक्कर और कई बार कर्मचारियों की उदासीनता—इन सबके बीच शोकाकुल परिवार मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से परेशान हो जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति और भी चिंताजनक है। वहां डिजिटल सुविधाओं की कमी, जानकारी का अभाव तथा इंटरनेट संबंधी समस्याएं आम लोगों के लिए अतिरिक्त कठिनाई पैदा करती हैं। कई परिवारों को यह तक पता नहीं होता कि मृत्यु का पंजीकरण किस कार्यालय में और कितने दिनों के भीतर कराना आवश्यक है। जानकारी के अभाव में समय निकल जाने पर उन्हें अतिरिक्त प्रक्रिया और विलंब का सामना करना पड़ता है। एक गंभीर समस्या दलालों की सक्रियता भी है। जहां व्यवस्था जटिल होती है, वहां बिचौलियों का जाल स्वतः फैल जाता है। आम नागरिक को यह विश्वास दिलाया जाता है कि बिना “सुविधा शुल्क” के उसका कार्य समय पर नहीं होगा। इससे न केवल भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है, बल्कि सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है। सरकार ने डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस के माध्यम से अनेक सेवाओं को ऑनलाइन किया है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी कई स्थानों पर तकनीकी खामियां, सर्वर की समस्या और प्रक्रियागत बाधाएं लोगों की परेशानी कम करने के बजाय बढ़ा देती हैं। यदि ऑनलाइन आवेदन के बाद भी नागरिक को कई बार कार्यालय जाना पड़े, तो डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। यह आवश्यक है कि मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को पूरी तरह नागरिक-केंद्रित बनाया जाए। अस्पताल में मृत्यु होने पर संबंधित अस्पताल से ही डिजिटल पंजीकरण स्वतः हो और निर्धारित समय सीमा के भीतर प्रमाण पत्र उपलब्ध कराया जाए। ग्राम पंचायतों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों में एकल खिड़की (Single Window) व्यवस्था लागू की जाए ताकि परिवारों को अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। साथ ही, सरकार को प्रत्येक जिले में समयबद्ध सेवा की व्यवस्था लागू करनी चाहिए। यदि निर्धारित अवधि में प्रमाण पत्र जारी नहीं होता है तो संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय हो। ग्रामीण क्षेत्रों में जनजागरूकता अभियान चलाकर लोगों को मृत्यु पंजीकरण की प्रक्रिया और समय-सीमा की जानकारी दी जानी चाहिए। प्रशासन को यह समझना होगा कि मृत्यु प्रमाण पत्र केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मानवीय सेवा है। जिस परिवार ने अपना प्रियजन खोया है, उसे सहानुभूति, सम्मान और त्वरित सहायता मिलनी चाहिए, न कि अनावश्यक परेशानियां।एक संवेदनशील शासन की पहचान यही है कि वह नागरिकों के जीवन के साथ-साथ उनके सबसे कठिन क्षणों में भी उनके साथ खड़ा दिखाई दे। मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया जितनी सरल, पारदर्शी और समयबद्ध होगी, उतना ही नागरिकों का विश्वास शासन-प्रशासन पर मजबूत होगा। अब समय आ गया है कि इस व्यवस्था में व्यापक सुधार कर शोकाकुल परिवारों को जटिल प्रक्रियाओं के मकड़जाल से मुक्त कराया जाए।

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