वैराग्य से वर्चस्व तक: अखाड़ों की बदलती तस्वीर, पद की दौड़ में खोती संत परंपरा
एम.पारिक
हरिद्वार। सनातन संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए सदियों से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अखाड़े आज आंतरिक राजनीति और वर्चस्व की लड़ाई के चलते सवालों के घेरे में हैं। जिन अखाड़ों ने त्याग, तपस्या, शौर्य और संत परंपरा को जीवंत रखने का कार्य किया, वहीं वर्तमान समय में पद और प्रभाव की राजनीति के आरोपों ने संत समाज की गरिमा को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं।अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ब्रह्मलीन नरेंद्र गिरि महाराज के निधन के बाद अखाड़ा परिषद की राजनीति में लगातार विवाद और गुटबाजी सामने आती रही है। वर्तमान में अखाड़ा परिषद दो गुटों में बंटी हुई नजर आ रही है। दोनों गुटों की ओर से आठ-आठ अखाड़ों के समर्थन का दावा किया जा रहा है। एक ओर जहां एक गुट में अखाड़ों के वर्तमान पदाधिकारी शामिल हैं, वहीं दूसरे गुट में ऐसे संतों की मौजूदगी बतायी जाती है, जो या तो वर्तमान में अखाड़ों के पदाधिकारी नहीं हैं, अथवा किसी कारणवश अखाड़ों की मुख्यधारा से अलग हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर वास्तविक अखाड़ा परिषद किसे माना जाए और किसके दावे को सही माना जाए। इस विवाद का अंतिम निर्णय भले ही संत समाज और अखाड़ों के जानकार ही कर सकते हों, लेकिन इस पूरी खींचतान का सबसे बड़ा नुकसान संत समाज की प्रतिष्ठा को हो रहा है। वर्चस्व की इस लड़ाई में संतों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और शक्ति प्रदर्शन ने त्याग और तपस्या की परंपरा को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। त्याग का संदेश देने वाले भगवाधारी संतों के बीच पद और प्रभाव को लेकर चल रही खींचतान यह सवाल खड़ा करती है कि क्या पद की लालसा वास्तव में वैराग्य की भावना पर हावी हो चुकी है। स्थिति यहां तक पहुंचती दिखाई दी कि एक अखाड़े पर कब्जे को लेकर भी संत समाज के कुछ लोगों की भूमिका पर सवाल उठे। आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर में कई बार ऐसे घटनाक्रम सामने आए, जिनसे संत समाज की गरिमा और उसकी परंपराओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए। एक वरिष्ठ संत द्वारा केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी में हरिद्वार के एक वरिष्ठ संत से अपनी जान को खतरा बताए जाने का मामला भी चर्चा में रहा। ऐसे घटनाक्रम यह सोचने को विवश करते हैं कि आखिर वह संत परंपरा कहां जा रही है, जिसमें व्यक्तिगत मान-अपमान और पद से ऊपर समाज, धर्म और सनातन की सेवा को महत्व दिया जाता था। अखाड़े केवल पद और प्रतिष्ठा के केंद्र नहीं हैं। इनका मूल उद्देश्य शास्त्र और शस्त्र दोनों की परंपरा को आगे बढ़ाना, सनातन संस्कृति की रक्षा करना और समाज को आध्यात्मिक दिशा देना रहा है। ऐसे में यदि अखाड़े आंतरिक राजनीति और पद की दौड़ का केंद्र बनते हैं तो इसका असर केवल संत समाज पर ही नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की व्यापक छवि पर भी पड़ता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि संत समाज आत्ममंथन करे। क्या पदों की संख्या सीमित होने के कारण संतों के बीच संघर्ष होना उचित है? क्या वर्चस्व की राजनीति त्याग और वैराग्य की मूल भावना के अनुरूप है? और क्या संत समाज को अपनी परंपराओं की गरिमा बचाने के लिए व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठने की जरूरत नहीं है? अखाड़ों की शक्ति उनकी एकता, अनुशासन और आध्यात्मिक परंपरा में रही है। यदि यही संस्थाएं क्षुद्र राजनीति और वर्चस्व की लड़ाई का केंद्र बनती हैं तो आने वाले समय में संत समाज को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। समय की मांग है कि अखाड़े पद की राजनीति से ऊपर उठकर फिर से त्याग, तपस्या, शास्त्र और शस्त्र की उस महान परंपरा की ओर लौटें, जिसने उन्हें सनातन संस्कृति में विशिष्ट स्थान दिलाया है।












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