गणेश दास गुट की वैधता पर उठे सवाल, विरोधी पक्ष बोला—यदि पहले निष्कासन गलत था तो उस समय बहिष्कार क्यों?
एम. पारिक
हरिद्वार। कुंभ मेला 2027 से पहले नया उदासीन अखाड़ा एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। संतों की वैधता को लेकर पहले से चल रहे विवाद के बाद अब ‘असली और नकली देवताओं’ की पूजा तथा शाही स्नान का मुद्दा सामने आने से अखाड़े के दो गुटों के बीच टकराव और गहरा गया है। कल उत्तरी हरिद्वार स्थित एक आश्रम में पंजाब से आए नया उदासीन अखाड़े के संतों की बैठक हुई। बैठक में आरोप लगाया गया कि हरिद्वार में वर्षों से ‘नकली देवताओं’ की पूजा कर उन्हें कुंभ के शाही स्नान में शामिल किया जाता रहा है, जबकि वास्तविक देव प्रतिमाएं पंजाब में सुरक्षित हैं। बैठक में अखाड़ा परिषद के एक गुट के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्र पुरी और महामंत्री श्रीमहंत हरि गिरि सहित कई संत मौजूद रहे। नया उदासीन अखाड़े के सचिव महंत गणेश दास ने कहा कि असली देवताओं का अपमान करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और उन्हें अखाड़े से बाहर किया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि आगामी कुंभ में केवल असली देव प्रतिमाओं का ही शाही स्नान कराया जाएगा। श्रीमहंत रविंद्र पुरी ने भी कहा कि नकली देवताओं की स्थापना और पूजा धार्मिक परंपराओं के विरुद्ध है। उन्होंने इस पूरे मामले की उत्तराखंड, पंजाब और उत्तर प्रदेश सरकार से जांच कराने की मांग की। उनका दावा है कि वास्तविक देव प्रतिमाएं महंत गणेश दास के संरक्षण में हैं और अखाड़ा परिषद का एक गुट उनके साथ खड़ा है।
विरोधी गुट ने आरोपों को बताया निराधार
वहीं, महानिर्वाणी गुट की ओर से राष्ट्रीय मीडिया संयोजक करौली शंकर महादेव महाराज ने इन आरोपों को निराधार बताया। उनका कहना है कि आरोप लगाने वाले संतों को पहले ही अखाड़ा विरोधी गतिविधियों के कारण निष्कासित किया जा चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि अब ये संत दूसरे गुट के समर्थन से भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। मामले में कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
‘देवता नकली कैसे हो सकते हैं?’
विरोधी पक्ष से जुड़े संतों ने ‘नकली देवता’ के आरोप पर सवाल उठाते हुए कहा कि देवता नकली कैसे हो सकते हैं। उनका कहना है कि जो नकली है, वह देवता हो ही नहीं सकता। उदासीन संप्रदाय में देवता के रूप में गोला साहेब की मान्यता है और ऐसे में किसी देवता को नकली बताना धार्मिक परंपराओं पर ही सवाल खड़ा करता है।इन संतों ने आरोप लगाने वाले गुट पर पलटवार करते हुए कहा कि यह बयानबाजी ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ वाली कहावत को चरितार्थ करती है। उन्होंने कहा कि यदि गणेश दास गुट उस समय वैध और वास्तविक था तो तत्कालीन अखाड़ा परिषद, जिसमें हरि गिरि और नरेंद्र गिरि जैसे संत प्रमुख भूमिका में थे, ने उन्हें बहिष्कृत क्यों किया था? उन्होंने सवाल उठाया कि या तो उस समय किया गया निष्कासन गलत था या फिर आज गणेश दास गुट का समर्थन करने वाले लोग अपने पुराने निर्णयों के विपरीत खड़े हैं। संतों का कहना है कि इस पूरे विवाद से संत समाज में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है और कुंभ से पहले अखाड़ों के बीच बढ़ता यह टकराव आने वाले समय में गंभीर रूप ले सकता है। फिलहाल, नया उदासीन अखाड़े में ‘असली-नकली देवताओं’, संतों की वैधता और पुराने बहिष्कार को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। अब देखना होगा कि कुंभ मेला 2027 से पहले अखाड़ा परिषद और संबंधित संत समाज इस विवाद का समाधान किस तरह निकालता है।












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