स्वामी चिदानंद सरस्वती बोले—आस्था के साथ जागरूकता और सेवा से ही गंगा संरक्षण जनआंदोलन बनेगा
श्रावण मास में कांवड़ यात्रियों का अभिनंदन, गंगा संरक्षण के साथ स्वच्छता और पर्यावरण रक्षा का दिलाया संकल्प
अमित गुप्ता
ऋषिकेश। नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत अर्थ गंगा मॉडल के तहत संचालित गंगा जागरूकता एवं गंगा आरती प्रशिक्षण कार्यशाला की 14वीं श्रृंखला का शुभारंभ परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती के पावन सान्निध्य में हुआ। देश के विभिन्न राज्यों से आए पुरोहितों एवं प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण कार्यशाला में उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यशाला का उद्देश्य गंगा आरती की परंपरा, उसके आध्यात्मिक महत्व, वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय दृष्टिकोण तथा गंगा संरक्षण में जनभागीदारी की भूमिका को जन-जन तक पहुंचाने के लिए प्रशिक्षित एवं सेवाभावी कार्यकर्ताओं को तैयार करना है। आयोजन के माध्यम से आस्था को जागरूकता, प्रशिक्षण को सेवा और सेवा को जनआंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। कार्यशाला का शुभारंभ पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस अवसर पर उन्होंने गंगा, भारतीय संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण के महत्व पर प्रतिभागियों को प्रेरणादायी संदेश दिया। प्रशिक्षण के प्रथम दिन की शुरुआत प्रातःकालीन योग एवं ध्यान सत्र से हुई।
इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हवन एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। प्रतिभागियों को गंगा आरती की विधि, परंपरा, अनुशासन, मंत्रों के महत्व तथा आरती के माध्यम से गंगा संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता का संदेश समाज तक पहुंचाने के विभिन्न पहलुओं का प्रशिक्षण दिया गया।
‘श्रावण शिवत्व को जागृत करने का अवसर’
पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती ने देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरती पर पहुंचे शिवभक्तों एवं कांवड़ यात्रियों का अभिनंदन करते हुए कहा कि श्रावण मास शिवत्व को जागृत करने का दिव्य अवसर है। प्रकृति की प्रत्येक बूंद शिव का अभिषेक करती है। यह समय शिवाभिषेक के साथ धराभिषेक का भी है। उन्होंने सभी से मां गंगा, प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने तथा स्वच्छता, सेवा और संवेदना को अपनी साधना बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भगवान शिव हमारे भीतर की शांति, करुणा और प्रेम का प्रतीक हैं। श्रावण मास में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन को शिवमय बनाने का प्रयास करना चाहिए।
गंगा संरक्षण केवल पूजा नहीं, जिम्मेदारी भी
स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा कि मां गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, आस्था और जीवनधारा हैं। गंगा की सेवा केवल पूजा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे जिम्मेदारी, कर्तव्य और जीवन साधना के रूप में अपनाना होगा। जब आस्था के साथ जागरूकता और सेवा के साथ संरक्षण का संकल्प जुड़ता है, तभी सशक्त जनआंदोलन का निर्माण होता है। उन्होंने कहा कि गंगा आरती केवल दीपों का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। आरती के प्रत्येक दीप में स्वच्छता, संरक्षण और संवेदना का संदेश निहित है। आरती के माध्यम से समाज को जोड़ने, युवाओं को प्रेरित करने और प्रत्येक व्यक्ति को गंगा संरक्षण का सहभागी बनाने की आवश्यकता है। स्वामी जी ने प्रशिक्षणार्थियों का आह्वान किया कि वे कार्यशाला से प्राप्त ज्ञान को अपने-अपने क्षेत्रों में लेकर जाएं और गंगा संरक्षण, जल संरक्षण, स्वच्छता तथा पर्यावरण जागरूकता के वाहक बनें। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति गंगा का प्रहरी बने, हर घाट स्वच्छता और संस्कार का केंद्र बने तथा हर हृदय में गंगा के प्रति श्रद्धा और जिम्मेदारी का भाव जागृत हो—यही अर्थ गंगा का वास्तविक संदेश है। कार्यशाला में प्रतिभागियों को गंगा के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं पर्यावरणीय महत्व के साथ गंगा आरती के आयोजन, प्रबंधन, अनुशासन और जनसंपर्क से जुड़े विभिन्न विषयों पर भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। परमार्थ निकेतन द्वारा आयोजित यह कार्यशाला नमामि गंगे मिशन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाते हुए गंगा संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है। आयोजन का मूल संदेश ‘आस्था के साथ जागरूकता, सेवा के साथ संरक्षण और संस्कारों के साथ पर्यावरण संरक्षण’ रहा।












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