अर्धकुंभ को कुंभ कहने पर श्री गंगा सभा की बैठक में हंगामा, परंपरा के अनुसार अर्धकुंभ ही रहेगा श्री गंगा सभा ने अपना रुख किया स्पष्ट

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डॉ. हिमांशु द्विवेदी

हरिद्वार। अर्ध कुंभ 2027 जिसको कुंभ कहे जाने को लेकर रार मची हुई है। हरिद्वार की प्रतिष्ठित हर की पैड़ी को संचालित करने वाली श्री गंगा सभा की वार्षिक बैठक में अर्ध कुंभ को कुंभ कहे जाने पर हंगामा हो गया तीर्थ पुरोहितों ने चर्चा के बाद बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि वर्ष 2027 का आयोजन धार्मिक परंपराओं के अनुसार अर्धकुंभ ही कहा और प्रचारित किया जाएगा। दरअसल पिछले कुछ समय से 2027 के आयोजन को लेकर कुंभ या अर्धकुंभ की बहस चल रही है। इस बीच गंगा सभा ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि सभा ने कहीं भी इस आयोजन को कुंभ नहीं लिखा है, बल्कि अपने सभी दस्तावेजों और पंचांग में इसे अर्धकुंभ के रूप में ही दर्ज किया है।बैठक में कई पुरोहितों और पदाधिकारियों ने इस विषय को उठाते हुए स्थिति स्पष्ट करने की मांग की। इससे पहले गंगा सभा के पूर्व अध्यक्ष और समाज के वरिष्ठ सदस्य अशोक त्रिपाठी तथा रामकुमार मिश्रा ने भी अर्धकुंभ को कुंभ लिखे जाने और इस मुद्दे पर गंगा सभा की चुप्पी पर सवाल उठाए थे।अशोक त्रिपाठी का कहना था कि गंगा सभा कुंभ का प्रमुख अंग है और वह प्राचीन धार्मिक परंपराओं में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ पर मौन नहीं रह सकती। उन्होंने कहा कि कुंभ कोई साधारण मेला नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है जो निश्चित समय और ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थिति में ही आयोजित होता है। बताया जा रहा है कि इन सवालों के बाद हुई बैठक में गंगा सभा ने स्पष्ट किया कि उसके पंचांग में भी वर्ष 2027 का आयोजन अर्धकुंभ के रूप में ही अंकित है और सभी स्नानों का उल्लेख भी अर्धकुंभ स्नान के रूप में किया गया है। सभा के पदाधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि गंगा सभा एक पौराणिक धार्मिक संस्था है और वह परंपराओं तथा धार्मिक मान्यताओं से अलग जाकर कोई निर्णय नहीं लेगी। गंगा सभा के इस स्पष्टीकरण के बाद अर्धकुंभ को कुंभ घोषित करने का विवाद अब सीमित रूप से कुछ अखाड़ों तक ही रह गया है। बताया जा रहा है कि कुछ अखाड़ों ने अर्धकुंभ के दौरान कुंभ की तरह पेशवाई निकालने को लेकर शासन को सहमति दी है। वही उत्तराखंड शासन अर्ध कुंभ को कुंभ के रूप में भव्य और दिव्य मनाने की घोषणा कर चुका है। और बजट भी उसी के अनुसार केंद्र से मांगा गया था। वहीं शासन के इस संदेश से केवल पांच अखाड़े ही सहमत हैं, बाकी आठ अखाड़े अभी भी शासन की घोषणा से दूरी बनाए हुए हैं। हालांकि गंगा सभा के रुख से साफ संकेत मिल रहे हैं कि धार्मिक परंपराओं के अनुसार 2027 का आयोजन अर्धकुंभ के रूप में ही माना जाएगा।

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