आर. के. जोशी
नोहर। राजस्थान की पावन धरा पर हनुमानगढ़ जिले में स्थित गोगामेड़ी धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। यहाँ वीर शिरोमणि जाहर वीर गोगाजी की समाधि और गुरु गोरखनाथ जी का अखंड धूना आज भी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है। यही कारण है कि यहाँ वर्षभर राजस्थान सहित उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली से लाखों श्रद्धालु धोक लगाने पहुँचते हैं।
इतनी विशाल धार्मिक महत्ता और अपार श्रद्धालु संख्या के बावजूद, यदि इस क्षेत्र में किसी चीज़ की सबसे भारी कमी खलती है, तो वह है—**सुदृढ़ रेल सुविधाएँ**। आज के आधुनिक दौर में भी गोगामेड़ी धाम तक पहुँचने के लिए यात्रियों को अत्यंत कष्टदायक सफर तय करना पड़ता है। वर्तमान रेल व्यवस्था की स्थिति को यदि “नगण्य” कहा जाए, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
### असीम श्रद्धा, मगर सफर बेहद कष्टदायक
देश के दूर-दराज के राज्यों से आने वाले श्रद्धालुओं को सबसे पहले दिल्ली या अन्य बड़े जंक्शन्स तक पहुँचना पड़ता है। वहाँ से सादुलपुर या हनुमानगढ़ तक की यात्रा पूरी करने के बाद उन्हें घंटों, और कई बार तो पूरी-पूरी रात रेलवे प्लेटफॉर्म पर गुजारनी पड़ती है। छोटे-छोटे बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं के साथ यात्रियों की यह पीड़ा किसी से छिपी नहीं है।
सादुलपुर रेलवे स्टेशन पर थके-हारे श्रद्धालु रातभर उचित ट्रेन कनेक्टिविटी के इंतजार में बैठे रहते हैं, लेकिन उनकी आस्था अडिग रहती है। उनके मन में केवल एक ही तड़प होती है—गोगाजी महाराज और गुरु गोरखनाथ जी के दर्शन।
### असुरक्षित सड़क मार्ग: मजबूरी का सफर
रेल सुविधाओं के अभाव में अधिकांश श्रद्धालुओं को मजबूरन सड़क मार्ग का सहारा लेना पड़ता है। लंबी दूरी की बस यात्राएँ न केवल थकाऊ होती हैं, बल्कि असुरक्षित भी साबित होती हैं। आए दिन होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में कई श्रद्धालु घायल हो जाते हैं और कई तो अपनी जान तक गंवा बैठते हैं। यदि रेलवे यहाँ बेहतर और सीधी व्यवस्था उपलब्ध कराए, तो इन हादसों में भारी कमी लाई जा सकती है।
### मेले में भी केवल “दिखावे” की रेल सेवा!
भादवा मेले के दौरान रेलवे कुछ स्पेशल ट्रेनें चलाने का दावा तो करता है, लेकिन यह व्यवस्था ऊंट के मुँह में जीरे के समान है। ये स्पेशल ट्रेनें अक्सर रेवाड़ी से गोगामेड़ी, या हनुमानगढ़ व सादुलपुर से गोगामेड़ी के बीच ही सिमट कर रह जाती हैं।
> **बड़ा सवाल:** जब मुख्य श्रद्धालु पंजाब, हिमाचल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों से आ रहे हैं, तो उन्हें बीच रास्ते में उतारकर रेलवे कौन सी सुविधा दे रहा है? यात्रियों को पहले हनुमानगढ़ या सादुलपुर तक भटकना पड़ता है, फिर वहाँ घंटों इंतजार कर छोटी दूरी की कनेक्टिंग ट्रेन पकड़नी पड़ती है। यह व्यवस्था सुविधा कम, परेशानी ज्यादा खड़ी करती है।
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### राजस्व भरपूर, फिर भी उपेक्षा क्यों?
हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं के आगमन से सरकार और स्थानीय प्रशासन को परिवहन, व्यापार, होटल और अन्य माध्यमों से भारी राजस्व (income) प्राप्त होता है। इस धाम से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। इसके बावजूद श्रद्धालुओं को मूलभूत रेल सुविधाओं से वंचित रखना बेहद चिंताजनक है। क्या रेल मंत्रालय इस बात से अनजान है कि गोगामेड़ी केवल एक स्थानीय मेला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर का आस्था केंद्र है?
### स्थायी और लंबी दूरी की ट्रेनों की दरकार
गोगामेड़ी धाम के लिए अब केवल अस्थायी और टुकड़ों में चलने वाली स्पेशल ट्रेनों से काम नहीं चलने वाला। आज आवश्यकता इस बात की है कि रेलवे यहाँ के लिए **स्थायी लंबी दूरी की ट्रेनों** का संचालन करे।
* **संभावित समाधान:** दिल्ली-हनुमानगढ़, दिल्ली-बीकानेर (वाया गोगामेड़ी), या दिल्ली-बठिंडा (वाया गोगामेड़ी) के रूप में नियमित ट्रेनें चलाई जा सकती हैं। इसके अलावा, पूर्वी भारत (बिहार/यूपी) से सीधी ट्रेन कनेक्टिविटी बेहद जरूरी है।
* मेले के दौरान पूरे महीने लंबी दूरी की विशेष ट्रेनें चलाई जानी चाहिए ताकि यात्रियों को बीच रास्ते में भटकना न पड़े।
### आस्था का सम्मान आवश्यक
देश के कई अन्य धार्मिक स्थलों को रेलवे द्वारा विशेष प्राथमिकता और विश्वस्तरीय सुविधाएँ दी गई हैं। ऐसे में गोगामेड़ी जैसे ऐतिहासिक और महात्म्यपूर्ण केंद्र की लगातार उपेक्षा समझ से परे है। श्रद्धालु सरकार से किसी विलासिता (luxury) की मांग नहीं कर रहे, वे केवल एक सुरक्षित, सुगम और सम्मानजनक यात्रा का अपना अधिकार मांग रहे हैं। करोड़ों लोगों की आस्था का सम्मान करते हुए अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार और रेल मंत्रालय इस दिशा में ठोस व गंभीर कदम उठाए।












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