वाराही देवी मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा को होती है पत्थरों की वर्षा

Spread the love

संवाददाता रमेश राम

लोहाघाट/ चम्पावत/ टनकपुर। देवीधुरा में वाराही देवी मंदिर के प्रांगण में प्रतिवर्ष रक्षाबंधन के अवसर पर श्रावणी पूर्णिमा को पत्थरों की वर्षा का एक विशाल मेला जुटता है। मेले की ऐतिहासिकता कितनी प्राचीन हैं, इस विषय में मत– मतांतर है लेकिन आम सहमति है कि नर बलि की परंपरा के अवशेष के रूप में ही बग्वाल का आयोजन होता हैं।
लोक मान्यता है कि किसी समय देवीधुरा के संघन वन में बावन हजार वीर और चौसठ योगनियों के आतंक से मुक्ति देकर स्थानीय जन से प्रतिफल के रूप में नर बलि की मांग की, जिसके लिए निश्चित किया गया कि पत्थरों की मार से एक व्यक्ति के खून के बराबर निकले रक्त से देवी को तृप्त किया जाएगा। पत्थरों की मार प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा को आयोजित की जाएगी। इस प्रथा को आज भी निभाया जाता हैं। लोक विश्वास हैं कि क्रम से महर और फर्त्याल जातियों द्वारा चंद शासन तक। यहां श्रावणी पूर्णिमा को प्रतिवर्ष नर बलि दी जाती थी। इतिहासकारों का मानना है कि महाभारत में पर्वतीय क्षेत्रों में निवास कर रही एक ऐसी जाती का उल्लेख है जो अश्म युद्ध में प्रवीण थी। तथा जिसने पाण्डवों की ओर से महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। ऐसी स्थिति में पत्थरों के युद्ध की परंपरा का समय काफी प्राचीन ठहरता है। कुछ इतिहासकार इसे आठवीं– नवीं ईसा से प्रारंभ मानते हैं। कुछ खास जाती से भी इसे संबंधित करते हैं।
बग्वाल की इस परंपरा को वर्तमान में “महर और फर्त्याल” जाती के लोग ही अधिक सजीव करते हैं। इनकी टोलिया डोल– नगाड़ों के साथ रिंगाल की बनी हुईं छतरी, जिसे छंतोली कहते हैं, सहित अपने –अपने गांवों से भारी उल्लास के साथ देवी मंदिर के प्रांगण में पहुंचती हैं। सिर पर कपड़ा बांध हाथों में लट्ठ तथा फूलों से सजा फर्रा –छंतोली लेकर मंदिर के सामने परिक्रमा करते हैं। इसमें बच्चे, बूढ़े, जवान सभी बढ़ –चढ़कर हिस्सा लेते है। बग्वाल खेलने वाले द्यौके कहे जाते हैं वह पहले दिन से सात्विक आचार व्यवहार रखते हैं देवी की पूजा का दायित्व विभिन्न जातियों का है। फुलारा कोट के फुलारा मंदिर में पुष्पों की व्यवस्था करते हैं। मानतांडे और ढोली गांव के ब्रह्मांड श्रावण की एकादशी के अतिरिक्ति सभी पर्वों पर पूजन करवा सकते है। भेसीरगांव के गढ़वाल राजपूत बलि के भैंसों पर पहला प्रहार करते हैं। बग्वाल का एक निश्चित विधान है। मेले के पूजन अर्चन के कार्यक्रम यद्यपि आषाढ़ी कौतिक के रूप में एक माह तक लगभग चलते हैं। लेकिन विशेष रूप से श्रावण माह की शुक्लपक्ष की एकादशी से प्रारंभ होकर भाद्रपक्ष, कृष्णपक्ष की द्वितीया तिथि तक परंपरागत पूजन होता हैं। बग्वाल के लिए सांगी पूजन एक विशिष्ट प्रक्रिया के साथ सम्पन्न किया जाता हैं। जिसे परंपरागत रूप से पूर्व से ही संबंधित चारो खाम (ग्रामवासियों का समूह) गढ़वाल चम्याल, वालिक तथा लमगड़ियों के द्वारा सम्पन्न किया जाता हैं। मंदिर में रखा देवी विग्रह एक संदूक में बंद रहता है। उसी के समक्ष पूजन सम्पन्न होता हैं। यही का भार लमगड़िया खाम के प्रमुख को सौंपा जाता हैं। जिनके पूर्वजों ने पूर्व में रोहिलो के हाथ से देवी विग्रह को बचाने में अपूर्व वीरता दिखाई थी। इस बीच अड़वाड़ का पूजन होता हैं जिसमें सात बकरे और एक भैंसे का बलिदान दिया जाता हैं।
पूर्णिमा को भक्तजनों की जय– जयकार के बीच डोला देवी मंदिर के प्रांगण में रखा जाता हैं। चारों खाम के मुखिया पूजन सम्पन्न करवाते हैं। गढ़वाल प्रमुख श्री गुरु पद से पूजन प्रारंभ करते हैं चारो ख़ामों के प्रधान आत्मीयता प्रतिद्वंता शौर्य के साथ बग्वाल के लिए तैयार होते हैं। द्यौके के अपने– अपने घरों से महिलाएं आरती उतार आशीर्वचन और तिलक– चंदन लगाकर हांथ में पत्थर देकर डोल नगाड़ों के साथ बग्वाल के लिए भेजती हैं। इन सबका मार्ग पूर्व में ही निर्धारित होता हैं मैदान में पहुंचने का स्थान व दिशा हर खाम की अलग होती हैं‌। उत्तर की ओर से लमगड़िया, दक्षिण की ओर से चम्याल, पश्चिम की ओर से वालिक और पूर्व की ओर से गाहड़वाल मैदान में आते हैं। दोपहर तक चारो खाम देवी के मंदिर के उत्तरी द्वार से प्रवेश करती हुई। परिक्रमा करके मंदिर के दक्षिण पश्चिम द्वार से बाहर निकलती हैं फिर वे देवी के मंदिर और बाजार के बीच के खुले मैदान में दो दलों में विभक्त होकर अपना स्थान घेरने लगते हैं।
दोपहर में जब मैदान के चारों ओर भीड़ का समुद्र उमड़ पड़ता है तब मंदिर का पुजारी बग्वाल प्रारंभ होने की घोषणा शुरू करता है। इसके साथ ही खामों के प्रमुख की अगुवाई में पत्थरों की वर्षा दोनों ओर से प्रारंभ होती हैं डोल का स्वर ऊंचा होता जाता हैं छंतोली से रक्षा करते हुए दूसरे दल पर पत्थर फेंके जाते हैं धीरे– धीरे बग्वाली एक दूसरे पर प्रहार करते मैदान के बीचों –बीच बने ओढ़ (सीमा रेखा) तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। फर्रा की मजबूत रक्षा दीवार बनाई जाती हैं। जिसकी आड़ से वे प्रतिद्वंदी दल पर पत्थरों की वर्षा करते हैं। पुजारी को जब अंतःकरण से विश्वाश हो जाता हैं कि एक मानव के रक्त के बराबर खून बह गया होगा, तब वह तांबे के छत्र और चम्बर के साथ मैदान में आकर बग्वाल सम्पन्न होने की घोषणा करता है। बग्वाल का समापन शंखनाथ से होता हैं तब एक दूसरे के प्रति आत्मीयता दर्शित कर द्योके धीरे– धीरे खोलीखाड़ दुबाचौड़ मैदान सविदा होते हैं मंदिर में अर्चन चलता है कहा जाता है कि पहले जो बग्वाल आयोजित होती थीं उसमें फर का प्रयोग नहीं किया जाता था परंतु सन् 1945 के बाद फर का प्रयोग किया जाने लगा। बग्वाल में आज भी निशाना बनाकर पत्थर मारना निषेध है।
रात्रि में मंदिर जागरण होता हैं श्रावणी पूर्णिमा के दूसरे दिन बक्से में रखे देवी विग्रह की डोले के रूप में शोभा यात्रा भी सम्पन्न होती हैं कई लोग देवी को बकरे के अतिरिक्त अड़वाड़ साथ बकरे तथा एक भैंस की बलि भी अर्पित करते हैं वैसे देवीधुरा का नैसर्गिक सौंदर्य भी मोहित करने वाला है इसलिए भी बग्वाल को देखने दूर– दूर से सैलानी देवीधुरा पहुंचते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *