संस्कृत विवि के दीक्षांत समारोह में 32 मेधावियों को गोल्ड मेडल, छह को पीएचडी की उपाधि
अमित कुमार
हरिद्वार। उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि.) ने कहा कि संस्कृत को केवल प्राचीन विरासत के रूप में संरक्षित रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे तकनीक, शोध, रोजगार और नवाचार की नई संभावनाओं से जोड़ना होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक, भाषा-विज्ञान और मशीन लर्निंग जैसे क्षेत्रों में संस्कृत की वैज्ञानिक संरचना एवं समृद्ध साहित्य के आधार पर व्यापक शोध की संभावनाएं हैं। राज्यपाल आज उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के 12वें दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने 32 छात्र-छात्राओं को गोल्ड मेडल और छह छात्रों को पीएचडी की उपाधि प्रदान की। उन्होंने लोक गायिका पद्मश्री माधुरी बड़थ्वाल सहित डॉ. अनुसूया प्रसाद पंत, प्रो. राम कुमार शर्मा और श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय को मानद उपाधियों से सम्मानित किया।
ज्ञान के साथ संस्कार और युवा ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण से जोड़ें
राज्यपाल ने उपाधि और पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को बधाई देते हुए कहा कि दीक्षांत समारोह केवल शिक्षा पूरी होने का अवसर नहीं, बल्कि जीवन की नई यात्रा और समाज एवं राष्ट्र के प्रति नई जिम्मेदारियों की शुरुआत है। विद्यार्थियों के पास ज्ञान, संस्कार और युवा ऊर्जा की शक्ति है। इन तीनों को समाज की आवश्यकताओं से जोड़कर सार्थक बनाना उनका दायित्व है। उन्होंने विद्यार्थियों से ज्ञान को निरंतर बढ़ाने, संस्कारों को जीवन में उतारने, समाजसेवा करने, नवाचार को अपनाने और राष्ट्र को सर्वोपरि रखने के पांच संकल्प लेने का आह्वान किया।
पुस्तकालय की अलमारियों से निकलकर डिजिटल दुनिया तक पहुंचे संस्कृत
राज्यपाल ने कहा कि संस्कृत को पुस्तकालयों की अलमारियों तक सीमित रखने के बजाय डिजिटल संसार, शोध प्रयोगशालाओं और वैश्विक ज्ञान-विमर्श तक पहुंचाने की आवश्यकता है। संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की ज्ञान-चेतना, चिंतन परंपरा और सांस्कृतिक स्मृति की प्रमुख वाहक है। वेद, उपनिषद, दर्शन, व्याकरण, आयुर्वेद और योग सहित भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा संस्कृत में सुरक्षित है। संस्कृत हमें शब्दों के साथ जीवन को देखने की दृष्टि, विवेक, कर्तव्यबोध और मानव कल्याण की भावना भी प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए अध्यापन के अलावा अनुवाद, शोध, भारतीय दर्शन, संस्कृति, प्रकाशन, डिजिटल मीडिया और भाषा-तकनीक जैसे क्षेत्रों में रोजगार एवं कार्य के नए अवसर मौजूद हैं। ऐसे में संस्कृत को रोजगार, शोध, तकनीक और नवाचार से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
‘अभिराज-पुस्तक-वीथी’ बनेगी ज्ञान की धरोहर
समारोह में राज्यपाल ने विश्वविद्यालय के विभिन्न प्रकाशनों का विमोचन किया। उन्होंने विश्वविद्यालय को करीब 10 हजार दुर्लभ पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं का दान करने के लिए पद्मश्री अभिराज राजेंद्र मिश्र के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि इन दुर्लभ ग्रंथों को ‘अभिराज-पुस्तक-वीथी’ के रूप में संरक्षित किया जाना आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण ज्ञान-संपदा साबित होगा। दीक्षांत समारोह की खास बात यह रही कि राज्यपाल ने अपना संबोधन संस्कृत भाषा में दिया और विद्यार्थियों को ज्ञान, संस्कार तथा राष्ट्रसेवा का संदेश दिया।
संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाने में समाज की भागीदारी जरूरी : धन सिंह रावत
विशिष्ट अतिथि संस्कृत शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कहा कि संस्कृत वैज्ञानिक एवं तर्कसंगत भाषा होने के साथ कंप्यूटर के अनुकूल भाषा भी है। इसमें जीवन विकास की व्यापक संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत अधिकांश भारतीय भाषाओं की शब्दावली को प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास कर रही है और समाज के प्रत्येक व्यक्ति को इसमें अपना योगदान देना चाहिए। विश्वविद्यालय में पारंपरिक विषयों के साथ शिक्षा शास्त्र और योग जैसे विषयों की पढ़ाई संस्कृत माध्यम से हो रही है। उन्होंने विश्वविद्यालय से शोध के क्षेत्र में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानक स्थापित करने की अपेक्षा जताई। संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार ने कहा कि संस्कृत का उत्थान केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। संस्कृत की विरासत को सुरक्षित रखते हुए उसे नवाचार से जोड़ना और जन-जन तक पहुंचाना समाज एवं नई पीढ़ी की भागीदारी से ही संभव होगा।
आधुनिक विषयों को संस्कृत अध्ययन से जोड़ा : कुलपति
कुलपति प्रो. रमाकांत पाण्डेय ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक एवं शोध उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा, भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध को आगे बढ़ाना विश्वविद्यालय का प्रमुख उद्देश्य है। परंपरागत विषयों के साथ आधुनिक विषयों को अध्ययन और अनुसंधान से जोड़ा गया है। विश्वविद्यालय का लक्ष्य संस्कृत को केवल परंपरा तक सीमित न रखकर शोध, शिक्षा और समाजोपयोगी ज्ञान का प्रभावी माध्यम बनाना है। इस अवसर पर प्राग्ज्योतिषपुर विश्वविद्यालय, गुवाहाटी के कुलपति प्रो. राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी, पूर्व कुलपति प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय, जिलाधिकारी मयूर दीक्षित, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नवनीत सिंह भुल्लर, कार्यपरिषद एवं विद्या परिषद के सदस्य, जनप्रतिनिधि, शिक्षकगण और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।











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