चार माह के उपचार के बाद लौट आई नन्ही बालिका के चेहरे की मुस्कान, तीन माह से दवाएं बंद होने के बावजूद लक्षण दोबारा सामने नहीं आए
डॉ. सत्यनारायण शर्मा ने कहा—औषधि के साथ पथ्य, परहेज और अनुशासित दिनचर्या भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा
अमित कुमार
हरिद्वार। एक नन्ही बालिका की मुस्कान लौटने की कहानी इन दिनों आयुर्वेदिक चिकित्सा के प्रति विश्वास और सकारात्मक अनुभव का उदाहरण बनकर सामने आई है। बालिका पिछले दो वर्षों से अधिक समय से सिर की त्वचा संबंधी गंभीर समस्या से परेशान थी। आधुनिक चिकित्सा विशेषज्ञों ने उसकी बीमारी का निदान ‘पायोडर्मा स्कैल्प’ (Pyoderma Scalp) के रूप में किया था। लंबे समय तक उपचार कराने के बावजूद अपेक्षित राहत नहीं मिलने पर परिवार ने आयुर्वेदिक चिकित्सा का सहारा लिया। डॉ. सत्यनारायण शर्मा के अनुसार, बालिका का आयुर्वेदिक पद्धति से उपचार शुरू किया गया। इसके साथ ही उसे निर्धारित आहार-विहार, पथ्य और परहेज का पालन करने की सलाह दी गई। बालिका और उसके परिवार ने उपचार के दौरान अनुशासन का विशेष ध्यान रखा। चिकित्सक के अनुसार, करीब चार माह के उपचार के बाद बालिका की सिर की त्वचा की समस्या में उल्लेखनीय सुधार हुआ और वह स्वस्थ महसूस करने लगी।
उपचार की एक और सकारात्मक बात यह रही कि आयुर्वेदिक औषधियां बंद हुए तीन माह से अधिक समय बीत चुका है और इस अवधि में अब तक रोग के लक्षण दोबारा सामने नहीं आए हैं। बालिका के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य उसके स्वास्थ्य में आए सुधार से बेहद खुश हैं। डॉ. सत्यनारायण शर्मा का कहना है कि आयुर्वेद केवल औषधियों के सेवन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शरीर की प्रकृति, खानपान, दिनचर्या और आहार-विहार के संतुलन को भी विशेष महत्व दिया जाता है।
उपचार के साथ पथ्य-पालन और संयम का सहयोग मिलने पर स्वास्थ्य लाभ की संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक रोगी की शारीरिक प्रकृति और रोग की स्थिति अलग होती है। इसलिए किसी भी चिकित्सा पद्धति का चयन उचित निदान और विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह के आधार पर ही किया जाना चाहिए। बालिका के उपचार से जुड़े पूर्व और बाद के चित्र भी इस अनुभव के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। डॉ. शर्मा ने इसे मानव सेवा के अपने संकल्प को और मजबूत करने वाला अनुभव बताते हुए बालिका के उज्ज्वल भविष्य और उत्तम स्वास्थ्य की कामना की।











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