शंकराचार्यों, संतों और धर्माचार्यों ने सर्वसम्मति से लिया संकल्प; विद्वत परिषद और संत-संन्यासी परिषद भी गठित
वैदिक परंपरा में प्रक्षेपों और विकृतियों की होगी विद्वत जांच, रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ेगी शुद्धिकरण की प्रक्रिया; ‘वैदिक आख्यान विज्ञान’ ग्रंथ का विमोचन
अमित कुमार
हरिद्वार। सनातन धर्म, वैदिक परंपरा और प्राचीन धर्मग्रंथों की प्रामाणिकता के संरक्षण के लिए देशभर के संतों, शंकराचार्यों और धर्माचार्यों ने पतंजलि में एक मंच पर जुटकर महत्वपूर्ण पहल की है। पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित अखिल भारतीय प्राच्य विद्या महासम्मेलन (AIOC) के दूसरे दिन ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ के गठन पर सर्वसम्मति बनी। इस पहल में देश की विभिन्न गुरु-परंपराओं, अखाड़ों, संत संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और सनातनी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भागीदारी की। सम्मेलन में शास्त्रों में समय के साथ कथित रूप से हुए प्रक्षेपों, मिलावट और विकृतियों का विद्वत अध्ययन कर उनकी प्रामाणिकता सुनिश्चित करने का संकल्प लिया गया। समिति के अंतर्गत दो प्रमुख इकाइयों विद्वत परिषद और संत-संन्यासी परिषद का गठन किया गया है। विद्वत परिषद में आचार्यों, शास्त्रों के विशेषज्ञों और विभिन्न विषयों के विद्वानों को शामिल किया जाएगा। यह परिषद शास्त्रों में कथित प्रक्षेपों और विकृतियों से जुड़े विषयों का गहन अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट संत-संन्यासी परिषद को सौंपेगी। इसके बाद रिपोर्ट का परीक्षण समिति का मार्गदर्शक मंडल करेगा। आवश्यक विचार-विमर्श और संशोधनों के बाद ही अंतिम निर्णय की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। समिति में सिख, जैन और बौद्ध परंपराओं का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित करने की बात कही गई है। संत-संन्यासी परिषद के संयोजक का दायित्व आचार्य महासभा के स्वामी परमात्मानंद महाराज को सौंपा गया है, जबकि विद्वत परिषद का संयोजक केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीनिवास वरखेड़ी को बनाया गया है। समिति गठन के दौरान योगऋषि स्वामी रामदेव भावुक भी हो उठे। उन्होंने संतों से आग्रह किया कि इस अभियान का श्रेय उन्हें नहीं, बल्कि समूचे सनातन समाज को मिलना चाहिए। उनका उद्देश्य सनातन की प्रतिष्ठा और गौरव को पुनर्स्थापित करना है। इस अवसर पर स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण द्वारा रचित सनातन धर्म के प्रसंगों पर आधारित वैज्ञानिक ग्रंथ ‘वैदिक आख्यान विज्ञान’ का विमोचन भी किया गया। सम्मेलन में स्वामी रामदेव ने कहा कि करोड़ों वर्षों से चली आ रही वेद, श्रुति, ऋषि और सनातन परंपरा अपने शुद्धतम स्वरूप में समाज के सामने आनी चाहिए। सनातन धर्म की वैज्ञानिकता का प्रचार संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि वेद विरुद्ध और सनातन विरुद्ध आचरण करने वालों तथा गौहत्या करने वालों का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक स्तर पर बहिष्कार होना चाहिए। यह अभियान किसी व्यक्ति विशेष के स्वार्थ या एजेंडे से प्रेरित नहीं, बल्कि सनातन की प्रतिष्ठा से जुड़ा सामूहिक संकल्प है। उन्होंने डिजिटल युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से धर्मग्रंथों के संदर्भों को लेकर फैलने वाली भ्रामक जानकारियों पर भी चिंता जताई। कहा कि बिना प्रामाणिक संदर्भों की जांच किए देवी-देवताओं और अवतारी महापुरुषों के चरित्र पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। ऐसे में शास्त्रों का प्रमाणिक अध्ययन और सही संदर्भों की पहचान जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा सनातन है और देश की वैचारिक एवं सांस्कृतिक पहचान इसी परंपरा से जुड़ी है। आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि संतों ने सनातन शास्त्र शुद्धि अभियान का जो संकल्प लिया है, उसे पूरी प्रमाणिकता, शक्ति और योजनाबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा। उन्होंने बताया कि षड्यंत्रपूर्वक विकृत किए गए भारतीय इतिहास का सनातन दृष्टिकोण से पुनर्लेखन करने का कार्य भी पतंजलि योगपीठ में चल रहा है। कार्ष्णि पीठाधीश्वर स्वामी गुरु शरणानंद महाराज ने सुझाव दिया कि समिति में ऐसे विद्वानों को शामिल किया जाए, जिनका आचरण शुद्ध हो और जिन्हें शास्त्रों का गहरा ज्ञान हो। उन्होंने गुरु कृपा और सत्य के महत्व पर बल देते हुए कहा कि सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं और मानवता की सेवा ही उपासना का व्यापक स्वरूप है। मलूक पीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्र दास महाराज ने कहा कि सनातन धर्म पर होने वाले अनुचित आक्षेपों का जवाब सभी परंपराओं के संतों और आचार्यों को एकजुट होकर देना चाहिए। उन्होंने वेदों को सनातन परंपरा का सर्वोच्च प्रमाण बताते हुए शास्त्र शुद्धि को वर्तमान समय की बड़ी आवश्यकता बताया। जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज ने ऑनलाइन संबोधन में कहा कि धर्मग्रंथों में कुछ बातें बाद में जोड़कर समाज में भ्रांतियां और विभाजन पैदा करने का प्रयास किया गया। उन्होंने शास्त्र शुद्धि अभियान का समर्थन करते हुए सभी शीर्षस्थ संतों और महापुरुषों से एकजुट होकर इसे सफल बनाने का आह्वान किया। स्वामी गोविंददेव गिरि महाराज ने कहा कि धर्मशास्त्रों में आए प्रक्षेपों का अध्ययन और शुद्धिकरण समय-समय पर आवश्यक है। उन्होंने स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की पहल की सराहना करते हुए अभियान को पूर्ण समर्थन दिया। ज्योतिष पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि सनातन परंपरा को कमजोर करने के प्रयास लंबे समय से होते रहे हैं। ऐसे में शास्त्रों की प्रामाणिकता बनाए रखने और शिक्षा में सनातन मूल्यों के विस्तार के लिए समिति का गठन समय की आवश्यकता है। आचार्य महासभा के स्वामी परमात्मानंद महाराज ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए अभियान को आवश्यक बताया। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि सनातन धर्म सबकी समानता और सम्मान की बात करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने सनातन धर्म की वैज्ञानिकता और भारत राष्ट्र को मजबूत करने पर बल दिया। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज ने कहा कि वेद और गीता के सिद्धांतों में संसार की अनेक समस्याओं का समाधान निहित है। अखिल भारतीय संत समिति के महासचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने शास्त्रों में हुए प्रक्षेपों के अध्ययन और सुधार का समर्थन किया। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ने शास्त्र शुद्धि के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता के समानांतर ‘ऋषि इंटेलिजेंस’ (RI) की अवधारणा पर भी जोर दिया। हरि सेवा आश्रम के महामंडलेश्वर स्वामी हरि चेतनानंद महाराज ने इस अभियान में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। सम्मेलन में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, विभिन्न अखाड़ों, मठों और धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भी अभियान को समर्थन दिया। इनमें महंत रविंद्र पुरी, साध्वी ऋतंभरा, माता अमृतानंदमयी, स्वामी विद्याश्रीष तीर्थ, स्वामी सत्यात्म तीर्थ सहित देश की अनेक प्रमुख संत विभूतियां शामिल रहीं। कई संतों ने वीडियो संदेश और ऑनलाइन माध्यम से भी अपनी सहमति व्यक्त की। कार्यक्रम में देश के विभिन्न मठों और पीठों के प्रतिनिधियों के साथ 23 विश्वविद्यालयों के कुलपति तथा संस्कृत, वेद, दर्शन और प्राच्य विद्या के विशेषज्ञ उपस्थित रहे। सम्मेलन के अंतर्गत आयोजित शास्त्र विमर्श में बेंगलुरु, वाराणसी, हैदराबाद, तिरुपति, दिल्ली, केरल और उत्तराखंड सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए लगभग 40 विद्वानों ने भाग लिया। उन्होंने सनातन शास्त्रों की प्रामाणिकता, ऐतिहासिक संदर्भों, वैदिक परंपरा और आधुनिक समय में शास्त्रीय ज्ञान की प्रासंगिकता पर विचार रखे। सम्मेलन में पतंजलि विश्वविद्यालय की प्रति-कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया, पतंजलि परिवार के वरिष्ठ सदस्य, विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधि, संन्यासी, संन्यासिनियां, शिक्षाविद और विद्यार्थी भी मौजूद रहे।











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