स्वामी रामदेव, डॉ. अशोक चक्रधर और डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ समेत देश-विदेश के दिग्गजों ने बुलंद की हिंदी के वैश्विक विस्तार की आवाज
भारतीय भाषाओं के सम्मान और संरक्षण के साथ हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने पर जोर
अमित कुमार
देहरादून। देश के पहले लेखक गाँव में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाए जाने की मांग को लेकर महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया। थानों स्थित लेखक गाँव में आयोजित अंतरराष्ट्रीय महोत्सव–2026 के तीसरे दिन देश-विदेश से जुटे साहित्यकारों, शिक्षाविदों और भाषाविदों ने हिंदी को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने के लिए व्यापक जनभागीदारी, कूटनीतिक पहल और संस्थागत प्रयासों की जरूरत बताई। वक्ताओं ने शिक्षा, प्रशासन, सिनेमा, मीडिया और डिजिटल माध्यमों में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग के साथ भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन का आह्वान किया। योगऋषि एवं पतंजलि योगपीठ के संस्थापक स्वामी रामदेव ने कहा कि हिंदी के प्रति जन-जन में प्रेम और अपनी भाषा के प्रति सम्मान जगाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने लेखक गाँव की सराहना करते हुए कहा कि यह परिसर साहित्य, संस्कृति और प्रकृति के प्रति समर्पण का अनूठा उदाहरण है। डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हिमालय के जल, जंगल, जीवन और पर्यावरण के प्रति उनका प्रेम उल्लेखनीय है।स्वामी रामदेव ने कहा कि अपनी भाषा का सम्मान राष्ट्रीय आत्मविश्वास का आधार है। भारत को समझने के लिए हिंदी और भारतीय संस्कृति की गहराई जानने के लिए संस्कृत से जुड़ना जरूरी है। उन्होंने हिंदी को जन-जन तक पहुंचाने और भारतीय सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने का आह्वान किया।
हिंदी का सम्मान, भारतीय भाषाओं के सम्मान के साथ
प्रसिद्ध कवि एवं पद्मश्री डॉ. अशोक चक्रधर ने हिंदी और भारतीय भाषाओं की एकता तथा देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंदी का सम्मान दूसरी भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के साथ आगे बढ़ना चाहिए। हिंदी व्यापक जनसंवाद का सशक्त माध्यम है और इसे वैश्विक पहचान दिलाने के लिए सामूहिक संकल्प जरूरी है। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडे ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि सामूहिक प्रयासों से हिंदी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिष्ठा दिलाई जा सकती है। साहित्यकार डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि हिंदी अब भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम तथा त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे देशों में प्रवासी भारतीय समुदायों के बीच हिंदी सांस्कृतिक संपर्क की महत्वपूर्ण भाषा है। सिनेमा, फिल्म-संगीत, मीडिया और डिजिटल मंचों ने हिंदी की वैश्विक पहुंच बढ़ाई है।
विदेशी विद्वानों ने भी हिंदी के पक्ष में उठाई आवाज
स्वीडन के उप्साला विश्वविद्यालय के भारतविद् प्रो. डॉ. हाइंस वर्नर वेसलर ने हिंदी में अपने विचार रखते हुए कहा कि विदेशों में हिंदी शिक्षण को अधिक व्यावहारिक और समकालीन बनाया जाना चाहिए। हिंदी के साथ भारतीय साहित्य और संस्कृति का अध्ययन भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए निरंतर कूटनीतिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक प्रयासों पर जोर दिया। ऑस्ट्रेलिया से आए अभिनेता, एंकर एवं सांस्कृतिक अध्येता चार्ल्स थॉमसन ‘बिहारी लाल’ ने ‘जय भारत, जय हिंदी’ के उद्घोष के साथ संबोधन शुरू किया। उन्होंने कहा कि देश की प्रगति के लिए मातृभाषाओं के प्रति सम्मान और आत्मविश्वास आवश्यक है। बुल्गारिया के सोफिया विश्वविद्यालय की लेखिका एवं इंडोलॉजी की प्रोफेसर मौना कौशिक ने कहा कि हिंदी को अकादमिक संस्थानों से आगे बढ़ाकर जन-जन की भाषा बनाने के लिए साहित्यिक आदान-प्रदान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देना होगा। ब्रिटेन के कथाकार एवं एमबीई सम्मान से अलंकृत तेजेंद्र शर्मा ने हिंदी को उसका अपेक्षित स्थान दिलाने के लिए शांतिपूर्ण, तार्किक और सकारात्मक जनजागरण की आवश्यकता बताई। नीदरलैंड से आए रमा तक्षक, अंडमान की तमिल भाषाविद् डॉ. एन. लक्ष्मी और मिजोरम के प्रो. सुशील शर्मा ने भी हिंदी के विकास के साथ भारतीय भाषाओं के बीच सहयोग और सांस्कृतिक एकता पर बल दिया।
‘हिंदी का विकास दूसरी भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं’
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने सभी वक्ताओं के विचारों का स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी का संवर्धन प्रत्येक भारतीय की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि हिंदी भारतीय भाषाओं के बीच सेतु का काम करती है और विभिन्न भाषायी समुदायों को जोड़कर राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाती है। डॉ. निशंक ने कहा कि हिंदी का विकास दूसरी भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं, बल्कि उनके सम्मान, संरक्षण और समृद्धि के साथ होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में हिंदी को स्थान दिलाने के लिए व्यापक जनसमर्थन, अंतरराष्ट्रीय संवाद और संस्थागत प्रयास आवश्यक हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी में संबोधन का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे प्रयासों से हिंदी की वैश्विक प्रतिष्ठा को बल मिला है। वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष अनिल जोशी ने हिंदी के संरक्षण और संवर्धन के लिए योजनाबद्ध प्रयासों पर जोर दिया। उन्होंने लेखक गाँव को देश-विदेश के हिंदीप्रेमियों को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण मंच बताया। लेखक गाँव की निदेशक विदुषी निशंक ने अतिथियों, साहित्यकारों और विद्वानों का स्वागत करते हुए हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के संकल्प से जुड़ने की अपील की। महोत्सव के तीसरे दिन हुए इस विमर्श में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग के साथ भारतीय भाषाओं के समन्वय और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का संदेश दिया गया। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि हिंदी की वैश्विक प्रतिष्ठा केवल प्रस्तावों से नहीं, बल्कि उसके व्यापक व्यावहारिक प्रयोग, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, साहित्यिक समृद्धि और निरंतर अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से मजबूत होगी।











Leave a Reply