शिव के 12 ज्योतिर्लिंग सांस्कृतिक एकता के प्रतीक: स्वामी परमिंदर पुरी

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अमित गुप्ता

देहरादून। शिव के यह 12 दिव्य ज्योतिर्लिंग पूरे भारत में एक सीधी रेखा के रूप में सांस्कृतिक एकता को दर्शाते हैं । और यह भी एहसास कराते हैं कि ईश्वर हर स्थान पर विद्यमान है । आस्था एवं भक्ति हु सच्ची उपासना है ।
अभय मठ शक्तिपीठ लक्ष्मण चौक स्थित *विश्राम के दिन* व्यास जी ने कहा कि अत्यंत तपस्वी महर्षि अत्रि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे और उनकी पत्नी अनुसूया पवित्रता की प्रतिमूर्ति थी । उनकी तप और सेवा अद्वितीय थी । एक बार त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अनुसूया की पवित्रता की परीक्षा ली और बाल स्वरूप में आकर भिक्षा मांगी, शर्त यह थी कि वह निर्वस्त्र होकर भिक्षा दें। देवी ने अपनी पवित्रता शक्ति से पहचान लिया और अपनी शक्ति से त्रिदेव को शिशु ही बना दिया और भिक्षा दी। बाद में तीनों देवों की प्रार्थना पर पूर्ण स्वरूप लौटाया। त्रिदेवों ने वरदान दिया कि वे सभी उनके पुत्रों के रूप में अवतार लेंगे , जिसके फलस्वरूप दत्तात्रेय , चंद्रमा और दुर्वासा मुनि की उत्पत्ति हुई ।
व्यास जी ने बताया कि श्री राम जो स्वयं शिव भक्त थे , लंका पर चढ़ाई से पूर्व रामेश्वर में ज्योतिर्लिंग की स्थापना कर शिव आराधना की और उन्हें प्रसन्न कर विजय का आशीर्वाद प्राप्त किया। कृष्ण अवतार में भी श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए व्यास ने बताया कि बाणासुर वध भी भगवान शिव की कृपा से हो पाया। सुमधुर भजन *गंगा तेरा पानी अमृत कल कल बहता जाए* और *ओम नमः शिवाय,ओम नमः शिवाय –हर हर भोले नमः शिवाय* के भजनों पर भक्तगण साहिर पूरा पंडाल झूम उठा।
इस अवसर पर विधायक सविता कपूर सहित सैकड़ों श्रोतागण उपस्थित थे।

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